Wednesday, January 6, 2016

कैसे कहूँ अनजान है तू

कैसे कहूँ अनजान है तू

जो सपनो मे दिखती है ।
मेरी यादों मे बसती है ।
जब तनहासा होता हूँ
तब सासोंमे हसती है ।।

ऐसे हसीन लमहो से,
मेरी लगती पहचान है तू
कैसे कहूं अनजान है तू ।। १।।

ऐसा था जब हाल नही
गिनता था जब साल नही
तुझसे बाते करने को
मै होता था बेहाल नही

तबसे मेरी धड़कन का
मुझको लगती अरमान है तू
कैसे कहू अनजान है तू ।।२।।

सोचता हूँ मुझसा दिल हो
मेरे लिये तू काबिल हो
सुख दुख के सब लमहो मे
संग मेरे तू शामिल हो

हाथ तेरा जो थाम लिया तो
अब लगती आसान है तू
कैसे कहूं अनजान है तू ।।३।।

अब आये हो तो आजाओ
मै खोया हूँ तुम खो जाओ
मै तो हूँ तैयार सदा ,
बस तुम भी मेरे हो जाओ

मान लिया अब सोच लिया
जान है तू वरदान है तू
कैसे कहूं अनजान है तू  ।।४।।

- श्रीकांत विजय चवरे
arvindanuj.blogspot.com

कैसे कहूँ अनजान है तू

कैसे कहूँ अनजान है तू

जो सपनो मे दिखती है ।
मेरी यादों मे बसती है ।
जब तनहासा होता हूँ
तब सासोंमे हसती है ।।

ऐसे हसीन लमहो से,
मेरी लगती पहचान है तू
कैसे कहूं अनजान है तू ।। १।।

ऐसा था जब हाल नही
गिनता था जब साल नही
तुझसे बाते करने को
मै होता था बेहाल नही

तबसे मेरी धड़कन का
मुझको लगती अरमान है तू
कैसे कहू अनजान है तू ।।२।।

सोचता हूँ मुझसा दिल हो
मेरे लिये तू काबिल हो
सुख दुख के सब लमहो मे
संग मेरे तू शामिल हो

हाथ तेरा जो थाम लिया तो
अब लगती आसान है तू
कैसे कहूं अनजान है तू ।।३।।

अब आये हो तो आजाओ
मै खोया हूँ तुम खो जाओ
मै तो हूँ तैयार सदा ,
बस तुम भी मेरे हो जाओ

मान लिया अब सोच लिया
जान है तू वरदान है तू
कैसे कहूं अनजान है तू  ।।४।।

- श्रीकांत विजय चवरे
arvindanuj.blogspot.com